इक भीड़ कुचल जाएगी, मुझे भी इसी दरिंदगी के साथ |

इक भीड़ कुचल जाएगी,

मुझे भी इसी दरिंदगी के साथ;

नफ़रतों के सौदागर अभी इल्ज़ाम ढूंढ रहे हैं।

  

बारी आपकी भी आएगी ज़रा ख़ौफ़ खाइयेगा;

वो आपमें से ही कमज़ोर-लाचार इंसान ढूंढ़ रहे हैं।

 

आँखें फेरूं भी तो कैसे,  मैं ज़माने की तरह;

हम नादान समझते नहीं

वो राम भी ढूंढ़ रहे हैं रहमान भी ढूंढ़ रहे हैं। 

 

ये क्या माज़रा है क्या मतला है समझाइये तो ज़रा;

 आप इन हैवानों में कैसे इंसान ढूंढ़ रहे हैं।

 

सियासत बेच खाएगी आपको याद रखियेगा;

वो अपने मतलब का मकान ढूंढ़ रहे हैं।